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GROUP - A : सामान्य अध्ययन ( GENERAL STUDIES ) BA-III VKSU ARA

GROUP - A : सामान्य अध्ययन (GENERAL STUDIES)  BA-III  VKSU ARA

प्रश्न 1. भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में सुभाषचंद्र बोस के योगदान पर प्रकाश डालें । 

उत्तर- सुभाषचन्द्र बोस का जन्म 23 जनवरी , 1897 को कटक में हुआ था । उनकी शिक्षा - दीक्षा का उत्तम प्रबंध किया गया । वे आई ० सी ० एस ० की परीक्षा में भाग लेने के लिए इंग्लैंड गए । परीक्षा में उन्हें सफलता मिली , लेकिन इससे उनमें कोई खुशी न हुई । वे देश सेवा को अपना परम कर्तव्य समझते थे । अतः उन्होंने 1921 में त्याग पत्र दे दिया । उन्होंने गाँधीजी से भेंट की ; किन्तु उनका कार्यक्रम उन्हें अच्छा नहीं लगा । इसके बाद वे देशबंधु चितरंजन दास से मिले । उनके विचार से वे काफी प्रभावित हुए और उनके अनन्य भक्त तथा सहयोगी बए गए । 1921 में सुभाष बाबू देशबंधु द्वारा स्थापित राष्ट्रीय कॉलेज के प्राचार्य नियुक्त हुए । उन्हें महात्मा गाँधीजी द्वारा संचालित आन्दोलन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक दल का कमाण्डर बनाया गया । प्रिंस ऑफ वेल्स के बहिष्कार आंदोलन में भाग लेने पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया । 1923 में स्वराज्य पार्टी की स्थापना हुई उन्होंने इसके सिद्धांतों दल का कमाण्डर बनाया गया । प्रिंस ऑफ वेल्स के बहिष्कार आंदोलन में भाग लेने पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया । 1923 में स्वराज्य पार्टी की स्थापना हुई । उन्होंने इसके सिद्धांतों का खुलकर संचार किया । कलकत्ता निगम में दल की विजय के बाद वे कार्यपालिका पदाधिकारी के पद पर नियुक्त हुए । 1925 में बंगाल अराजक आदेश के अंतर्गत उन्होंने मंडाले जेल भेज दिया गया । जेल से मुक्त होने बाद वे रचनात्मक कार्यों में जुट गए खादी का प्रचार , छात्र युवकों संघ का गठन राष्ट्रीय शिक्षण संस्थाओं की स्थापना , आदि उनके कार्यक्रम बन गए । नेहरू रिपोर्ट के विरुद्ध उन्होंने एक छात्र पार्टी बनाई जिसका नाम ' स्वतंत्र संघ ' रखा गया । उन्होंने साइमन कमीशन के बहिष्कार आंदोलन में भाग लिया और गिरफ्तार कर लिए गए । उन्होंने गाँधीजी -इरविन समझौता का कठोर विरोध किया कराची अधिवेशन में उन्होंने गाँधीजी की नीति की तीव्र आलोचना की । 1931 में गांधीजी के द्वितीय गोलमेज सम्मेलन से लौटने के बाद पुनः सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हुआ । सुभाष बाबू पुनः गिरफ्तार कर लिए गए। इसके पश्चात् वे इलाज कराने के लिए यूरोप गए । वहाँ उन्होंने एक वक्तव्य में कहा , " राजनीतिक नेता के रूप में महात्मा गाँधीजी असफल रहे हैं और कांग्रेस को नए सिरे से संगठित करना चाहिए । यदि ऐसा न हुआ तो एक नया दल स्थापित करना पड़ेगा । " 1939 में गाँधीजी से उनका मतभेद अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया । गाँधीजी के विरोध के बावजूद ये काँग्रेस के अध्यक्ष चुने गए । इस अवसर पर गाँधीजी ने कहा " पट्टाभि की पराजय मेरी पराजय है । " अंत में सुभाष बाबू को त्याग पत्र देना पड़ा । उन्होंने एक नए दल की संगठन की जिसे ' फारवर्ड ब्लॉक ( Foward Block ) कहते हैं । के जनवरी , 1942 तक 2 जुलाई , 1940 को भारत सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत सुभाषचंद्र बोस को गिरफ्तार कर कलकत्ता के प्रेसीडेंसी जेल में बंद कर दिया । निरंतर अस्वस्थता कारण उन्हें 5 दिसम्बर को छोड़ दिया गया । 17 जनवरी , 1941 को कलकत्ता स्थित अपने मकान से रात में वह चुपके से निकल गए और कार से गोमो पहुँचे । वहाँ रेलगाड़ी से वे पेशावर चल पड़े । वहाँ से इटालियन पासपोर्ट लेकर वह रूस गए और 28 मार्च , 1941 को विमान द्वारा मास्को से बर्लिन पहुंचे । हिटलर के सहयोगी रिबेन टाप ने उनका स्वागत किया । बोस ने प्रस्ताव रखा कि वे बर्लिन रेडियो से ब्रिटिश विरोधी प्रचार करेंगे , जर्मनी में भारतीय युद्ध बंदियों में से लोगों को चुनकर आजाद हिन्दी सेना बनाएँगे तथा केंद्रीय राष्ट्र ( जर्मनी , इटली एवं जापान ) भारतीय स्वाधीनता की संयुक्त घोषणा करेंगे । बोस के प्रथम दो प्रस्तावों को स्वीकार कर लिया गया । भारतीय सैनिकों के दो दस्ते बनाए गए । जर्मनी में सुभाष की उपस्थिति पहले गुप्त रखी गई , लेकिन 1942 के आरंभ तक यह बात जाहिर हो गई । जर्मनी में ही उनके नाम के आगे ' नेताजी ' शब्द जोड़ा गया । नेताजी ने रोम और पेरिस में भी आजाद भारत केन्द्र ( Free India Centre ) कायम किए । उन्होंने भारतीयों की जो सेना खड़ी की , उसके सैनिकों की संख्या तीस हजार तक हो गई । इसी बीच 15 फरवरी , 1942 को जापानियों को सिंगापुर पर भी कब्जा हो गया जहाँ हजार भारतीय युद्धबंदी बनाए गए । जापानी फौजी अफसर मेजर फूजीहारा ने उन्हें कप्तान मोहन सिंह को सुपुर्द कर दिया । इन युद्धबंदियों में से भारतीय सैनिकों को लेकर मोहन सिंह ने आजाद हिन्दी फोज ( Indan National Army ) खड़ी की । दक्षिण - पूर्व एशिया के अनेक नौजवान भारतीय स्वतंत्रता के लिए   लड़ने के लिए इस फौज में भर्ती हुए । उनके प्रशिक्षण के लिए अनेक सैनिक शिविर खोले गए सितंबर 1942 को आजाद हिन्द फौज की विधिवत स्थापना कर दी गई। 13 जून , 1943 को सुभाष टोकिया पहुंचे । वहाँ के प्रधानमंत्री तोजो ने उनका बड़ा स्वागत किया तोजों ने जापानी संसद में घोषणा की , " जापान ने इढ़ता के साथ फैसला किया है कि वह भारत से अंग्रेजों को निकाल बाहर करने और उनके प्रभाव को नष्ट करने के लिए सबको मदद देगा तथा भारत को पूर्ण स्वाधीनता प्राप्त करने में समर्थ बनाएगा । " सुभाष ने टोकियो पर बोलते हुए ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ सशस्त्र संग्राम में दृढ़ निश्चय और पूर्वी सीमा में आक्रमण करने की घोषणा की 2 जुलाई , 1943 को ये सिंगापुर पहुंचे जहाँ उनका शानदार किया गया । उन्हें भारतीय स्वतंत्रता संघ ( Indian Independence League ) का गया । सिंगापुर में उन्होंने स्वतंत्र भारत की स्थायी सरकार बनाने और आजाद हिन्द भारत जाने की घोषणा की आजाद हिन्दी फौज के पुनर्निमाण की घोषणा कर दी उसका निरीक्षण किया और नारा बुलंद किया , ' चलो दिल्ली ' । 25 अगस्त , 1943 को सुभाष खु फौज के सेनापति बने । उन्होंने इसके संगठन और प्रशिक्षण पर जोर दिया । प्रवासी भारतीय युवतियों को लेकर झाँसी की रानी रेजीमेंट बनाई गई । फौज को अध्यक्ष बनाया लेकर गई । सुभा आजाद हिन्दी फौज को शुरू से ही अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा । प्रथम भारतीय अफसर इसे पसंद न करते थे । उनमें से अनेक इसे छोड़कर अंग्रेजों के साथ जा मिले । द्वितीय जापानी सरकार की नीति भी इसके प्रति स्पष्ट न थी । तृतीय फौजो ट्रेनिंग का इंतजाम न था । इससे असंतुष्ट होकर भारतीय नौजवानों ने युवक संघ ( Youth Leage ) बनाया । मोहन सिंह जानते थे कि जापानी शासक आजाद हिन्दी फोज को अपना हथकंडा बनाए रखना चाहते है । वह यह भी जानते थे कि उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है । अफसरों के नाम रख दिया था । यदि उन्हें गिरफ्तार कर अतः उन्होंने एक मुहरबन्द लिया जाता तो आजाद हिन्द पत्र भारतीय फोन भंग कर दो जाए और सारे दस्तावेज नष्ट कर दिए जाए । उनकी गिरफ्तारी के बाद यही हुआ । आजाद हिन्द फौज भंग कर दी गई । आजाद हिंद फौज में पहले गांधीजी , आजाद एवं नेहरू दस्ते बनाए गए इन तीनों के चुने सैनिकों को लेकर सितंबर , 1943 में मलाया के ताइपिंग में पहली छापामर रेजीमेंट बनाई गई जिसका नाम सुभाष ब्रिगेड रखा गया । इसका मुख्य हिस्सा जनवरी 1944 में रंगून पहुंचा 4 जनवरी , 1944 को सुभाष जापानी हवाई जहाज से रणून पहुँचे और वहाँ अपना सदर दफ्तर कायम किया । इसके बाद सुभाष ब्रिगेड युद्ध संचालन की दृष्टि से बर्मास्थित जापानी सेनापति के अधीन कर दी गई । सुभाष ब्रिगेड की दूसरी और तीसरी बटालियन रंगून से क्रमश : 4 और 5 फरवरी , 1944 को रवाना हुई और मांडले होकर कलेवा पहुंची । यहाँ अंग्रेजों की छापामार सेना बहुत सक्रिय थी आजाद हिन्द फौज से उनपर धावे बोलकर उन्हें कई बार पराजित किया आजाद हिन्द फौज इस अपार सफलता से उत्साहित होकर ब्रह्मपुत्र नदी पार कर बंगाल में घुस गई लेकिन इसी बीच आजाद हिंद फौज की सेना मार्च 1944 में कोहिमा पहुँच गई । कोहिमा पर तिरंगा झंडा फहरा दिया गया । कोहिमा में जापानी सेना की हालत खराब होने लगी । इम्फाल पर जापानी कब्जा न कर सके । दीमापुर और कोहिमा की ओर से अंग्रेजों का जबर्दस्त हमला शुरू हुआ। आजाद हिन्द फौज को पीछे हटकर चिन्दविन नदी के पूरब चले जाना पड़ा । इस तरह सुभाष बिग्रेड का भारत मुक्ति अभियान समाप्त हो गया । आजाद हिन्दी का यह अभियान भारत राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन का एक बहुत हो शानदार अध्याय है । भारतीय उसके सैनिकों को वोरता की सराहना करते हैं और श्रद्धा के साथ स्मरण करते हैं । उनका अनुपम त्याग , शौर्य एवं बलिदान भारतीयों को अपने देश की स्वाधीनता की रक्षा की प्रेरणा देता रहेगा । 21 अक्टूबर , 1943 को सिंगापुर की विशाल जनसभा में सुभाष ने स्थायी सरकार की स्थापना की घोषणा की । 23 अक्टूबर , 1943 को स्थायी सरकार की ओर से बोस ने ब्रिटेन और संयुक्त राज्य अमेरिका के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की । 31 दिसंबर , 1943 को सुभाष अंडमान - निकोबार पहुंचे और दोनों टापुओं का प्रशान स्थाई सरकार के हाथ से से लिया । लेकिन , सहसा जापान के पराजित होने के कारण आजाद हिन्द फौज तिवर - बितर हो गई और उसके अफसरों को गिरफ्तार कर लिया गया । उसी समय वायुयान दुर्घटना में नेताजी का निधन हो गया । और साहसी पुरुष थे । उन्हें गाँधीजी इस प्रकार , नेताजी एक वौर के सत्य , अहिंसा और सत्याग्रह आंदोलन में विश्वास नहीं था । ये जर्मनी के चांसलर बिस्मार्क की तरह रक्त शस्त्र  ( Policy of Iron and Blood ) के समर्थक थे और इसी के द्वारा भारत की आजादी हासिल करना चाहते थे । उन्होंने आजाद हिन्दी फौज केवल पूर्वी एशिया के वस्तुतः उनका जीवन इतिहास भारत बल्कि अति का पुनर्गठन कर अपार साहस और उत्साह का परिचय दिया । समस्त भारतीयों में एक नवीन स्फूर्ति का आकर्षक है तथा यह पियों से हुआ संचार है । से भरा हुआ है । यह रहस्यवाद और वास्तविकता तथा धार्मिक भावना और उन्होंने न किया बचपन में हो देशबंधु चितरंजन दाम के विचारों से से काफी प्रभावित हुए । व्यावहारिकता का अद्भुत सम्मिश्रण है । देश सेवा को अपना परम कर्तव्य समझते थे । और हानि के बारे में लिखें । 

प्रश्न 2. सूचना के अधिकार से आप क्या समझते है ? इससे समाज में होने वाले लाभ और हानि के   के बारे में लिखें। 

उत्तर -सूचना का अधिकार ( Right of Information ) - सूचना का अधिकार अधिनियम को राष्ट्रपति ने 5 जून को 2005 को अपनी मंजूरी दी थी तथा यह कानून 12 अक्टूबर , 2005 से पूरे देश में लागू हो गया । अधिनियम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें सूचना पाने का अधिकार प्रत्येक नागरिक को दिया गया है । यदि कोई अधिकारी सूचना देने से मना करता है , तो उस पर 25 हजार रुपये जुर्माना और उसको चरित्र पंजिका में प्रतिकूल टिप्पणी दर्ज हो सकेगी इसे अन्तर्गत केन्द्र को एक केन्द्रीय सूचना आयोग गठित करना होगा । इस आयोग के एक मुख्य सूचना आयुक्त होंगे । इस आयोग के काम काज को देख - रेख , दिशा - निर्देश और प्रबन्धन जैसे मामलों की शक्तियाँ मुख्य सूचना आयोग के पास होगी , जिसमें अन्य सूचना आयोग के पास होगी , जिसमें अन्य सूचना आयुक्त सहायता करेंगे । इसी तरह राज्य सरकारें भी प्रदेश सूचना अधिकारी नियुक्त करेंगी , जो मुख्य सूचना आयुक्त के प्रति जवाबदेह होंगे । इस अधिनियम के अंतर्गत केन्द्र और राज्यों के प्रशासन के अतिरिक्त पंचायत स्थानीय निकाय और सरकार से धन पाने वाले गैर - सरकारी संगठन भी आते हैं । इसके अतिरिक्त इस कानून के अन्तर्गत जीवन और स्वतन्त्रता से जुड़े विषयों की सूचना पाने के आवेदनों पर अधिकारियों को 48 घण्टे के भीतर जवाब देना होगा । यह कानून जम्मू - कश्मीर को छोड़कर पूरे देश में लागू हो गया है । सुरक्षा एवं गुप्तचर संगठनों को इस अधिनियम की परिधि से दूर रखा गया है । लाभ - हानि जहाँ तक सूचना के अधिकार के विस्तार से दूरगामी प्रभावों का प्रश्न है , तो जहाँ भी किसी व्यक्ति को विकास कार्यों या सार्वजनिक कार्यों में गधी की संभावना मालूम होगी , वह जिम्मेदार अफसर या कर्मचारी से इसकी सूचना पाने का अधिकारी होगा । गाँववासियों को थोड़े भी संदेह पर कि विकास कार्य ठीक से नहीं हुआ है या जितने लोगों को उचित कानूनी मजदूरी पर रोजगार मिलना चाहिए था , नहीं मिला तो वे सीधे इससे संबंधित कागजातों बिल , बाउचर , मस्टररॉल आदि के निरीक्षण की माँग कर सकते हैं । पंचायत या ब्लाक के रिकार्ड में कागज देखे जा सकते हैं कि किसी नहर , सड़क या स्कूल के भवन निर्माण का कार्य कब किया गया , इसमें कितना काम हुआ , कितना सीमेंट - इंट लगाया गया व मजदूरी सहित कुल कितना खर्च हुआ । फिर गाँव में सड़क , नहर या स्कूल आदि निर्माण स्थलों की मौके पर जाँच कर आसपास के लोगों से बातचीत कर यह अच्छी तरह पता लगाया जा सकता है कि जो सरकारी रिकार्ड में दिखाया गया है वह फर्जी है या सही । इस प्रकार भ्रष्टाचार पर प्रमाणिक लगाम लगायी जा सकती है गाँववासी आवश्यकता पड़ने पर इस विषय पर एक जन सुनवाई में गाँव लोगों को बुलाया जायेगा व विकास कार्यों संबंधी जो जानकारी के गाँववासियों की अपनी जाँच से प्राप्त हुई है , उसे सबके सामने रखा जायेगा तथा जन सुनवाई में उनका अपना पक्ष प्रस्तुत करने के लिए सूचना के अधिकार के सभी उपयोग व बुलाया जा सकता है । आर्थिक इसके कोई आश्चर्य नहीं कि आर ० टी ० आई ० कानून बनने के दस साल बाद भी इसको संकल्पना अपने प्रारंभिक चरण में ही है । राज्यों में हालात बदतर हैं । वहाँ , सरकारी कर्मचारी सूचना देने को अपना काम नहीं मानते । सूचना अधिकार कानून के तहत सूचना माँगने वाले आम आवेदकों को राज्य में परेशान किया जाता है । अक्सर दोषी अधिकारियों को सजा नहीं हो जाती जुर्माना लगाया जाता है , पर उसका भी अनुपालन कम ही होता है । यही नहीं , राज्यों में सूच आयुक्तों की नियुक्ति पूरी तरह से राजनीतिक तौर पर होती है , ऐसे में ज्यादातर सूचना आयुक्त इसे महज आय का एक जरिया भर मानते हैं और अपनी आगे की राजनीतिक महत्वाकांक्षा को पूरी करने में लगे रहते हैं । इसके बावजूद भी इसमें कोई दो राय नहीं है कि सूचनाधिकार कानून ने सरकारी मुलाजिमों और राजनेताओं के मन में खौफ पैदा आर ० टी ० आई ० के तहत सूचना माँगने वालों को धमकी सरकारी तंत्र की खामियों को उजागर करते हुए लाखों लोगों को न्याय दिलाया है । पर यह भी सच है कि हाल के वर्षों में आर ० टी ० आई ० कानून के दुरुपयोग में भी जबर्दस्त इजाफा हुआ है कई मामलों में इस कानून का गलत तरीके से इस्तेमाल किया जा रहा है । लोकहित के नाम पर लोग निरर्थक , बेमानी और निजी सूचनाओं की माँग कर रहे हैं , जिससे मानव संसाधन और सार्वजनिक धन का व्यय हो रहा है । साथ ही इसके द्वारा निजता में दखलअंदाजी की जा रही है । यदि इस कानून की दस साल की उपलब्धियों की बात करें तो आज आर ० टी ० आई ० ने कर दिया है । वहीं प्रतिकार में मिलना सामान्य बात हो गई है अगर किसी सूचना से किसी बड़ी हस्ती को नुकसान होने की संभावना होती है , तो उस स्थिति में सूचना माँगने वाले की हत्या होना अस्वाभाविक नहीं है । कानून लागू होने से लेकर अब तक दर्जनों आर ० टी ० आई ० कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है । फिर भी तमाम खामियों के बावजूद आर ० टी ० आई ० कानून समाज के दबे - कुचले और वंचित लोगों के बीच उम्मदी की आखिरी किरण माना जा रहा है । पूर्व मुख्य केन्द्रीय सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्लाह का भी मानना है कि आर ० टी ० आई ० के माध्यम से समाज के वंचित तबके को उसका अधिकार मिल सकता है । इस कानून के जरिए आमम आदमी शासन में अपनी सहभागिता सुनिश्चित कर सकता है और यही कानून शासन को आम जनता के प्रति जवाबदेही भी बनाता है । इसमें कोई संदेह नहीं कि लोकतंत्र की वास्तविक परिभाषा और गांधीजी की ग्राम स्वशासन की अवधारणा सूचना के अधिकार कानून से और अधिक पल्लवित हुई है । सूचना का अधिकार कनून भारत की उस मानसिक स्थिति का घोतक कि यह देश सिर्फ आँकड़ों में विकास नहीं चाहता , बल्कि विकास के साथ वह अपने नागरिकों अधिकारों के प्रति जागरुक भी करना चाहता है । देश का सम्यक् विकास भी इसी अवधारणा को ध्यान में रखकर हो सकता है , अन्यथा एकांगी विकास बेमानी होगा । है को संयुक्त संस्था की के 

प्रश्न 3. विश्व स्वास्थ्य संगठन ( W.H.O) के बारे में उल्लेख करें । 

उत्तर- विश्वव्यापी पैमाने पर स्वास्थ्य की समस्या के समाधान की दिशा में संयुक्त राष्ट्र के अंतर्गत विश्व स्वास्थ्य संगठन की स्थापना की गई है । राष्ट्रसंघ के स्वास्थ्य संगठन का राष्ट्र के विश्व स्वास्थ्य संगठन के रूप में पुनर्जन्म हुआ है । अतः स्पष्ट है कि इस स्थापना के बहुत पूर्व से हो स्वास्थ्य के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रयास जारी था पेरिस में 1909 में ही स्वास्थ्य के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय कार्यालय की स्थापना की गई थी। संयुक्त राष्ट्र विशिष्ट अभिकरणों में विश्व स्वास्थ्य संगठन    ( WHO ) का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है । इस संगठन की स्थापना 7 अप्रैल 1948 को संयुक्त राष्ट्र की आर्थिक एवं सामाजिक परिषद् द्वारा हुई । यही कारण है कि 7 अप्रैल को समस्त विश्व में स्वास्थ्य दिवस के रूप में मनाया जाता है । उद्देश्य ( objective ) - इस संगठन के संविधान में कहा गया है कि " स्वास्थ्य बीमारी या दुर्बलता का अभाव नहीं है , वरन पूर्ण शारीरिक मानसिक और सामाजिक आरोग्य की दशा है । इसका मौलिक उद्देश्य ' विश्व के देशों की जनता द्वारा स्वास्थ्य को उच्चतम संभव दशा को प्राप्त करना है । विश्व के पिछड़े हुए लोगों को मलेरिया तथा क्षयरोग आदि से बचाने का यह प्रयास करता है । विश्व स्वास्थ्य संगठन के कार्य ( Functions of World Health Organization ) विश्व स्वास्थ्य संगठन की प्रस्तावना में इस बात पर बल दिया गया है कि प्रत्येक व्यक्ति का यह मौलिक अधिकार है कि उसे उच्चतम स्वास्थ्य की सुविधाएँ मिले । विश्व की शांति और सुरक्षा के लिए आवश्यक है कि सब व्यक्तियों के स्वास्थ्य का ध्यान रखा जाए। स्वास्थ्य संबंधी उद्देश्यों की पूर्ति के लिए यह संगठन जो कार्य करता है , उन्हें दो श्रेणियों में रखा जा सकता है  (i)परामर्शदात्री सेवाएँ और ( ii ) तकनीकी सेवाएँ । ये सेवाएँ का संचालन और समन्वय करती है । इन परामशों और तकनीकी सेवाओं के स्वास्थ्य संबंधी कार्यों अच्छे परिणाम निकते हैं उदाहरण के लिए , दुनिया से मलेरिया का प्राय : उन्मूलन हो गया है । विश्व को महामारियों और बीमारियाँ समाप्त हुई है । इसमें प्रदर्शन टोलियों और सलाहकारों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है । संगठन के विभिन्न परामर्शदाता क्षयरोग , मातृ एवं बाल सुरक्षा पोषण तथा स्वच्छता आदि क्षेत्रों काम करा हैं । इस संगठन की देखरेख में स्वास्थ्य संबंधी , अनुसंधान एवं अध्ययन होते रहते हैं तथा अंतर्राष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यक्रम और विभिन्न गोष्ठियाँ आयोजित की जाती है । इस संगठन द्वारा संपादित कार्यों को इन रूपों में रखा जा सकता है - ( 1 ) अंतर्राष्ट्रीय TARGET सामान्य स्तर पर स्वास्थ्य          ( 2 ) अध्ययन एवं पर्यावरण संबंधी कार्यों का संचालन और समन्वय करना । स्वास्थ्य के क्षेत्र में संयुक्त राष्ट्र तथा उसके विशिष्ट अभिकरणों एवं संस्थाओं से संपर्क बनाए रखना संगठन के सहयोग से प्रतिदिन के भोजन में सुधार करके स्वास्थ्य लाभ तथा अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के सहयोग से श्रमिकों के स्वास्थ्य को ठीक रखने का प्रयास करना । जैसे विश्व खाद्य

 ( 3 ) संक्रामक रोगों तथा महाभारियों को समाप्त करना । 

( 4 )अप्रत्याशित घटनाओं को रोकने संबंधी सिफारिशें करना। 

( 5 )स्वास्थ्य के क्षेत्र में अनुसंधान करना ।

( 6 )स्वास्थ्य , शिक्षा आदि के स्तर को ऊंचा करना ।

 ( 7 ) विभिन्न बीमारियों के अंतर्राष्ट्रीय नामों का निर्धारण करना 

( 8 ) विश्व के लोगों के स्वास्थ्य की परिस्थितियों की दशाओं में सुधार करने का प्रयास करना ।

 ( 9 ) विभिन्न देशों में मातृमंगल तथा बाल स्वास्थ्य तथा विभिन्न कल्याण क्षेत्रों की वृद्धि 

 ( 10 ) स्वास्थ्य दवाइयों खा पदार्थों तथा अन्य वस्तुओं के संबंध में अंतर्राष्ट्रीय स्तर ( standard ) निश्चित करना 

प्रश्न 4. ग्राम पंचायत किसे कहते हैं ? इसके संगठन पर प्रकाश डालें । 

उत्तर - देहात की स्थानीय संस्थाओं में ग्राम पंचायत का स्थान सबसे महत्वपूर्ण है । भारत में ग्राम पंचायत का इतिहास बहुत पुराना है । फिर भी स्वतंत्रताप्राप्ति के बाद इसको पुनः गठित किया गया 1947 ई ० में बिहार में पंचायती राज कानून बना । इसके अनुसार पूरे राज्य में 1949 ई ० में ग्राम पंचायतों की स्थापना की जाने लगी। 1959 ई ० में इस कानून में संशोधन हुआ । पुनः 1990 ई ० में ग्राम पंचायत ( संशोधन ) अधिनियम बना । पुनः 1993 ई ० में बिहार पंचायत राज अधिनियम पारित किया गया है । भविष्य में इसी अधिनियम के अनुसार ग्राम पंचायतों का गठन किया जाएगा । इस अधिनियम की विशेषता यह है कि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के साथ - साथ पिछड़ी जातियों के लिए भी स्थान आरक्षित करने का प्रावधान है । यहाँ 1990 ई ० के अधिनियम के अनुसार ही ग्राम पंचायत के गठन और कार्यों का वर्णन किया जा रहा है 

ग्राम पंचायत का संगठन - एक हजार आबादीवाले गाँव में ग्राम पंचायत का संगठन किया जा सकता है । ग्राम पंचायत एक या एक से अधिक गाँवों को मिलाकर भी स्थापित की जा सकती है । किसी गाँव की आबादी अधिक होने पर उस गाँव में एक से अधिक ग्राम पंचायतों की स्थापना हो सकती है। 1993 ई ० के बिहार पंचायत अधिनियम के अनुसार सामान्यत : 7,000 आबादीवाले गाँव और गाँवों को मिलाकर एक ग्राम पंचायत की स्थापना होगी पठारी क्षेत्र में 5,000 की आबादी पर एक ग्राम पंचायत की स्थापना होगी । वर्ष तक हो गया है पहले श्रेणियों के 

श्रेणी -1959 ई ० के बाद ग्राम पंचायतों को तीन श्रेणियों में बाँट दिया गया था प्रथम श्रेणी की पंचायत , द्वितीय श्रेणी की पंचायत , तृतीय श्रेणी की पंचायत अब ग्राम पंचायतों की श्रेणियाँ समाप्त कर दी गई हैं ।

 कार्यकाल -अब ग्राम पंचायत का कार्यकाल पाँच अनुसार ग्राम पंचायतों के कार्यकाल अलग - अगल थे ।                  ग्राम पंचायत के मुख्य अंग _

( 1 ) ग्रामसभा - ग्राम पंचायत की एक ग्रामसभा होती है । गाँव अथवा के सभी वयस्क स्त्री एवं पुरुष जिनकी अवस्था 18 वर्ष या अधिक है , इसके सदस्य होते हैं । पागल , दिवालिया और अपराधी ग्रामसभा के सदस्य नहीं होते । ग्रामसभा की बैठक हर तीन महीने पर एक बार होनी चाहिए । वैसे , मुखिया किसी समय सामान्य या विशेष अधिवेशन बुला सकता है ग्राम पंचायत के 1/10 सदस्यों की माँग पर आमसभा बुलाता है । ग्रामसभा जनवरी - मार्चवाली पहली तिमाही के सामान्य अधिवेशन में अन्य विषयों के साथ अगले वित्तीय वर्ष के लिए बजट पर भी विचार करती है तथा उसे स्वीकृत करती है । अगले अधिवेशनों के लिए विकास योजनाओं में प्रगति आदि पर विचार किया जाता है । 

( ii ) कार्यकारिणी समिति- ग्राम पंचायत की एक कार्यकारिणी समिति होती है मुखिया कार्यकारिणी समिति का प्रधान होता है । कार्यकारिणी समिति में मुखिया को छोड़कर 16 सदस्य होते हैं । निर्वाचन के लिए पंचायत को 8 वाडों में बाँट दिया जाता है और प्रत्येक से 2 सदस्य निर्वाचित होकर आते हैं ।

 मुखिया — मुखिया ही सही रूप में ग्राम पंचायत का प्रधान होता है । मुखिया गाँव में शांति बनाए रखता है । मुखिया गाँव की सफाई एवं जनस्वास्थ्य के लिए भी उत्तरदायी है । वह पंचायत की समिति की रक्षा करता है । सरकारी मालगुजारी वसूलने में भी वह सरकार की सहायता करता है । सरकारी कर्ज की वसूली में भी वह सरकार की सहायता करता है । उपमुखिया- प्रत्येक पंचायत में एक उपमुखिया का पद भी है । मुखिया की गैर हाजिरी में उपमुखिया ही मुखिया के सभी काम करता है और उसके अधिकारों का उपयोग करता है ।

 ( iii ) पंचायत सेवक - पंचायत सेवक ग्राम पंचायत का एक सरकारी कर्मचारी है । इसकी नियुक्ति राज्य सरकार करती है पंचायत सेवक ग्राम पंचायत के सभी कागजात सुरक्षित रखता है । वह पंचायत का प्रमुख सलाहकार होता है । ग्राम पंचायत के सभी अंगों के कार्य संचालन में वह मदद करता है । 

( iv ) ग्रामरक्षा - दल - ग्रामरक्षा दल को ग्राम स्वयंसेवक दल भी कहते है । इसे ग्राम पुलिस के नाम से भी पुकारा जाता है । 18 वर्ष से लेकर 30 वर्ष की उम्र के स्वस्थ युवक इसमें भर्ती हो सकते हैं । इसका एक दलपति होता है । ग्राम रक्षा दल का मुख्य काम गाँव में शांति और सुरक्षा कायम रखना है । चोरी , डकैती , अगलगी , बाढ़ इत्यादि में भी ग्राम रक्षा - दल आवश्यक सेवाएँ प्रदान करता है ।

 ( v ) ग्राम कचहरी ‐‐प्रत्येक पंचायत में एक ग्राम कचहरी होती है । यह पंचायत की न्यायपालिका है । ग्राम कचहरी में एक सरपंच तथा 16 पंच होते हैं । सरपंच ही इसका प्रधान होता है । पंचों के चुनाव के लिए पंचायत को 8 वार्डो में बाँट दिया जाता है और प्रत्येक से 2 पंच चुनकर आते हैं । ग्राम कचहरी का कार्यकाल 5 वर्ष है । ग्राम कचहरी में एक उपसरपंच होता है । 

मुकदमों की सुनवाई - ग्रामकचहरी को गाँव के छोटे - छोटे मुकदमा सुनने का अधिकार है । दीवानी मामलों में ग्राम कचहरी 100 रुपये से 500 रुपये तक के मुकदमों की जाँच कर सकती है । फौजदारी मुकदमों में ग्राम कचहरी एक महीने की कैद और 100 रुपये तक जुर्माना कर सकती है । ग्राम कचहरी के फैसले के विरुद्ध अपील नहीं होती । विशेष परिस्थिति में अपील की जा सकती है ।

 ग्राम पंचायत के कार्य - बिहार पंचायत राज           ( संशोधन ) अधिनियम , 1990 के अनुसार ग्राम पंचायत के कार्यों की एक लम्बी सूची बनाई गई है । उसके कुछ मुख्य कार्य इस प्रकार हैं

1. कृषि प्रसार सहित कृषि 

2 . लघु - सिंचाई , जल प्रबंधन एवं नदी तट - विकास  

3.पशुपालन , मुर्गीपालन , मछलीपालन इत्यादि       

4. लघु उद्योग , खादी , ग्रामीण एवं कुटीर उद्योग 

5. ग्रामीण आवास

 6. पेय जल 

7 . ईधन एवं चारा  

9 . पथ , पुल , पुलिया , घाट , जलमार्ग एवं संचार के अन्य साधन शिक्षा , पुस्तकालय , सांस्कृतिक कार्यक्रम 

10. बाजार , मेला , औषधालय , परिवार कल्याण , शिशु एवं महिला , विकलांग , कमजोर वर्ग आदि का कल्याण

 11. लोकवितरण की व्यवस्था

 12. कुओं , तालाबों एवं पोखरों का निर्माण 

13. कृषि ऋण की सुविधा बढ़ाना और गरीबी दूर करने के उपाय 

14. महामारी तथा संक्रामक रोगों का नियंत्रण एवं निवारण 15. सरकार के निर्देश के अनुसार ग्रामीण विकास योजनाओं को कार्यान्वित करना

 16. अन्य कार्य जो समय - समय पर सरकार सौंपे ।

 प्रश्न 5. पंचायती राज व्यवस्था के संगठन एवं कार्यों पर प्रकाश डालें ।

 उत्तर- पंचायती राज - शासन में विकेन्द्रीकण के सिद्धांत को लागू करने के लिए भारत में पंचायती राज की स्थापना की गई थी । पंचायती राज लागू करने का अधिकार राज्य सरकार को है । बिहार सरकार ने 1961 ई ० में पंचायत समिति एवं जिला परिषद् अधिनियम बनाकर बिहार में पंचायती राज की व्यवस्था की । पंचायती राज का अर्थ है ग्राम स्तर पर ग्रामपंचायत , प्रखंड स्तर पर पंचायत समिति और जिला स्तर पर जिला परिषद् । 1993 ई ० के बिहार पंचायत राज अधिनियम के अनुसार पंचायत समिति एवं जिला परिषद् अधिनियम को निरस्त कर दिया गया है । 

पंचायत समिति — सरकार देहाती क्षेत्रों में पंचायती राज की स्थापना करना चाहती है । अतः ग्राम  प्रखंड जिला स्तरो पर पंचायतीराज की बात सोची गयी बिहार सरकार ने 1961 ई ० में पंचायत समिति और जिला परिषद् कानून ग्राम , प्रखंड और जिला जिन स्तरों पर पंचायती संस्थाओं को बात सोची गई , बिहार सरकार ने भी बनाया । वर्तमान में पंचायत समिति और जिला परिषद् ( संशोधन ) अधिनियम , 1990 के अनुसार प्रत्येक प्रखंड में एक पंचायत समिति की स्थापना की जा रही है । भविष्य में 1993 ई ० के बिहार पंचायत राज अधिनियम के अनुसार ही पंचायत समितियों का गठन किया जाएगा । वर्तमान में पंचायत समिति एवं जिला परिषद् ( संशोधन ) अधिनियम , 1990 के अनुसार ही पंचायत समितियाँ गठित हैं। 

संगठन पंचायत समिति में निम्नलिखित सदस्य होते हैं ‐

( i ) निर्वाचित सदस्य - प्रखंड की प्रत्येक पंचायत के सदस्यों द्वारा निर्वाचित दो सदस्य । जनसंख्या के अनुपात में अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए चक्रानुक्रम से अधिकतम जनसंख्या के आधार पर पंचायत या पंचायतें आरक्षित की जाएँगी । कम से कम एक पद अनुसूचित जाति अथवा जनजाति के लिए अवश्य आरक्षित रहेगा । आरक्षित पदों की कुल संख्या का कम से कम तीस प्रतिशत स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित रखे गए हैं । वर्तमान में बिहार में 50 प्रतिशत स्थान पंचायत में महिलाओं के लिए आरक्षित कर दिया गया है । 

( ii ) पदेन सदस्य -निर्वाचन से भरे जानेवाले सदस्यों के अतिरिक्त पंचायत समिति के अंतर्गत प्रत्येक ग्राम पंचायत का मुखिया पंचायत समिति का पदेन सदस्य होगा । 

( iii ) सह - सदस्य– ( क ) विधान और लोकसभा का प्रत्येक सदस्य जिसका निर्वाचन क्षेत्र प्रखंड की पंचायत समिति में पूर्णत : या अंशत : हो । ( ख ) राज्यसभा और विधानपरिषद् के सदस्य जो पंचायत समिति के निवासी हों । कार्यकाल — सभी सदस्यों का कार्यकाल 5 वर्षों का होता है । पदेन सदस्य अपने पदों पर बने रहने तक ही पंचायत समिति के सदस्य होंगे । यथासम्भव निर्वाचन नहीं होने की स्थिति में सदस्यों का कार्यकाल पाँच वर्षों के अतिरिक्त छह मास तक बढ़ाई जा सकेगी । 

     सदस्यों की योग्यता वही व्यक्ति पंचायत समिति का सदस्य हो सकता है जो , 

( i ) भारत का नागरिक हो , 

( ii ) न्यूनतम 25 वर्ष की आयु का हो ,

 ( iii ) सरकार के अंदर किसी लाभ के पद पर नहीं हो , 

( iv ) पागल , दिवालिया तथा अपराधी नहीं हो । 

प्रमुख - पंचायत समिति का एक प्रमुख होता है जिसका निर्वाचन पंचायत समिति के निर्वाचित एवं पंचायत समिति के क्षेत्राधीन प्रत्येक ग्राम पंचायत का मुखिया तथा सभी ग्राम पंचायत की कार्यपालिका समिति के सदस्यों द्वारा किया जाता है । 

उपप्रमुख - पंचायत समिति का एक उपप्रमुख भी होता है । उपप्रमुख का निर्वाचन भी प्रमुख जैमा ही पंचायत समिति के निर्वाचित सदस्य एवं पंचायत समिति के क्षेत्राधीन प्रत्येक ग्रामपंचायत का मुखिया तथा सभी ग्रामपंचायतों की कार्यपालिका समिति के सदस्यों द्वारा किया जाता है । प्रमुख की अनुपस्थिति में उपप्रमुख ही प्रमुख के सभी कार्यों का संपादन एवं अधिकारों का प्रयोग करता हैं । प्रमुख भी समय - समय उसे आवश्यक काम सौंप सकता है । 

प्रखंड विकास - पदाधिकारी -- प्रखंड विकास पदाधिकारी ( बी ० डी ० ओ ० ) पंचायत समिति का सचिव होता है । प्रमुख की अनुमति से वह पंचायत समिति की बैठक बुलाता है और उसकी कार्यवाही का रेकार्ड रखता है । पंचायत समिति की बैठक में भाग लेने का उसे अधिकार है , परंतु मतदान करने का नहीं । 

पंचायत समिति के कार्य - पंचायत समिति पर विकास का काम सौंपा गया है । यह समिति देहाती क्षेत्र के विकास के लिए कई आवश्यक कार्य कर सकती है । इसके कार्यों की जानकारी निम्नांकित रूप से की जा सकती है :

 ( 1 ) शिक्षा संबंधी कार्य- ( i ) प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था ( ii ) नए स्कूलों की स्थापना ( iii ) मिडिल दर्जे तक छात्रवृत्ति देना ( iv ) वयस्क शिक्षा का प्रबंध ( v ) स्कूल पुस्तकालयों की व्यवस्था में सहयोग ( vi ) वाचनालयों और पुस्तकालयों की स्थापना । 

( 2 ) कृषि संबंधी कार्य- ( i ) खेती की पैदावार बढ़ाने के लिए अच्छे बीज बाँटना ( ii ) खाद का वितरण । ( iii ) खेती के लिए नए नए औजारों का प्रचार और प्रयोग ( iv ) वृक्ष लगाना । ( v ) मछली पालना ( vi ) खेती के लिए कर्ज का प्रारंभिक कार्य करना ( vii ) लघुसिंचाई की व्यवस्था करना ( viii ) भू - संरक्षण की व्यवस्था करना ( ix ) बागवानी का विकास ।