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चित्रकला

इतिहास की अविच्छिन्नता के सम्बन्ध में हमारी जानकारी में कुछ अन्तराल होने के बावजूद भारतीय चित्रकला का आरंभ आदिमकालीन मनुष्य की उस कला से माना जाता है , जो होशंगाबाद , मिर्जापुर और भीमबेटका जैसे स्थानों पर कन्दराओं और गुफाओं में सुरक्षित रही हैं । मैग्डेली काल (ई . पू . 15000 वर्ष ) की पाषाणकालीन चित्रकला का इतिहास इतना पुराना नहीं लगता । किन्तु यह बात सभी लोग स्वीकार करते हैं कि यदि समुदाय एक दूसरे से पृथक रहते हों तो आदिमकालीन प्रज्ञाशक्ति एवं कल्पना काफी लम्बी अवधि तक जीवित रहती हैं । इन चित्रकारियों में उस आदिमकालीन कला की जीवन्त यथार्थता का दर्शन होता है , जो स्पेन में अल्तामीरन और फ्रांस में लासकोक्स जैसे अनेक स्थानों पर प्राप्त हुई हैं । शिकार का दृश्य , घायल सुअर का खुला मुंह जो उसकी पीड़ा को अभिव्यक्त करता है , इनके छायाचित्र छायानाट्य का दृश्य उपस्थित करते हैं । सिंधु घाटी सभ्यता काल ( ई0 पू03000-1500 वर्ष ) एक परिष्कृत शहरी सभ्यता का काल था , लेकिन चूंकि उस समय के मकान आदि शेष नहीं हैं , अतः भित्तिचित्र हमें नहीं मिल सके । लेकिन प्राचीन क्रीट की एजियन सभ्यता में भित्ति चित्रकारी और मिट्टी के बर्तनों की चित्रकारी में काफी समानता मिलती है । अतः संभव है कि सिंधु घाटी सभ्यता काल में भी खूब भित्ति चित्रकारी की गई हो , क्योंकि मिट्टी के बर्तनों की जो चित्रकारी हमें बड़ी मात्रा में मिली है ( अर्थपूर्ण अमूर्तता तक का परिचायक है ) वह उसकी परिपक्वता और उसकी व्याप्ति - लयात्मक शैली में ऊर्जस्वी यथार्थता से लेकर हो सकता है कि अजंता की सबसे पुरानी चित्रकारी ईसा पूर्व पहली शताब्दी की हो और सबसे नई चित्रकारी आठवीं शताब्दी की हो । हीनयान या प्रारम्भिक बौद्ध धर्म ने शायद उस भावना को सही रूप में नहीं समझा था , क्योंकि उसने केवल क्षणभंगुर वस्तुओं और पीड़ा की सर्वव्यापकता को ही देखा । जब सिद्धार्थ ने महल छोड़ा तो वह अपने शिशु पुत्र को भी अपने साथ ले जाना चाहते थे , किन्तु वह उसे नहीं ले जा सके , क्योंकि बच्चे की मां ने नींद में भी अपने पुत्र के ऊपर रक्षा का हाथ रखा था । ज्ञान प्राप्ति के बाद भी उन्हें यह बात याद रही और उन्होंने सब लोगों से सब जीवों की रक्षा की बात कही । उन्होंने निर्वाण स्वीकार नहीं किया , बल्कि पीड़ा से त्रस्त मानवता की सहायता के लिए केवल मनुष्य के रूप में ही नहीं , बल्कि हिरण , हाथी और हंस के रूप में जन्म लिया । जातक कथाओं में इन अवतारों ( जन्म धारण ) के जीवन के उतार - चढ़ाव का विशद वर्णन है और अजंता के कलाकारों ने लहरदार रेखाओं और सूक्ष्मग्राही रंगों में इनका चित्रण किया । इन भित्ति चित्रों में शहर देहात , वन , हर प्रकार के पुरुषों , स्त्रियों , जीव जंतुओं और वनस्पति का चित्रण है । जब बौद्ध धर्म एशिया के शेष भाग में फैला , तो शान्ति के संदेश के साथ तूलिका और छेनी भी गए । अर्जता अपनी शैली की स्पष्ट छाप के साथ एशियाई चित्रकला और भित्ति चित्रकारी का स्रोत बन गया । श्रीलंका में सिगिरिया में अफगानिस्तान में बामियान में चीन में प्राचीन रेशमी मार्ग पर स्थित अनेक स्थानों में , कोरिया में और जापान में होरियुली में इसे देखा जा सकता है । भित्ति चित्रकारी भारत में प्रचलित रही चालुक्यों की बादामी ( छठी शताब्दी ) , पल्लवों का पनमलै ( सातवीं शताब्दी ) , पांड्यों की सित्तन्नावसल ( नवीं शताब्दी ) , चोलों के तंजौर ( बारहवीं शताब्दी ) , विजयनगर की लेपाक्षी ( सोलहवीं शताब्दी ) और उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक विभिन्न शताब्दियों में केरल की भित्ति चित्रकारी - किन्तु उसका वेग घटता रहा । 

       मुगलकालीन कृति नूरजहां

          इसी बीच सतही व्यापक भित्ति चित्रकारी ने पांडुलिपियों पर लघु चित्रकारी का रूप ग्रहण किया - शुरू में ताड़ के पत्रों पर , बाद में कागज पर बंगाल के पाल शासकों के काल ( दसवीं और बारहवीं शताब्दी ) की लघु चित्रकारी में अजंता की ऐन्द्रिय लीक अनुरक्षित है । किन्तु उसके बाद द्रुत पराभव आया और लीक नाजुक और कोणीय हो गई । में यही शैली पश्चिमी भारत में फैली और बारहवीं से पन्द्रहवीं शताब्दी की अवधि में बहुत - सी प्रदीप्त पांडुलिपियों में देखी जा सकती है । इनमें से अधिकांशः पांडुलिपियां जैन धर्म ग्रंथों की हैं । लेकिन पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध और सोलहवीं शताब्दी के प्रथम चतुर्थांश में परिवर्तन की हवा चलने लगी । वसन्त विलास , बिल्हण की और पंचाशिका और लौर चन्दा जैसी कविताओं की गीतमयता की अनुक्रिया के परिणामस्वरूप वह लीक पुनः नमनीय हो गई और रंग चमकदार हो गए । मुगलों के आगमन से पहले ही भारतीय लघु चित्रकारी की एक उत्तम चित्रमय शैली स्थापित हो चुकी थी । यद्यपि अकबर के दरबार में फारस के कलाकारों का प्राधान्य था , किन्तु मुगल चित्रकला फारसी चित्रकला की एक प्रान्तीय शैली नहीं कही जा सकती । फारसी चित्रकला रोमांस के स्वर्गीय लोक की ओर अभिमुख है , जबकि अकबर की रुचि समसामयिकता में दीखती है । कलाकक्ष ( स्टूडियो ) और उसकी कार्यशैली की व्यवस्था ने विदेशी शैली के द्रुत देशीकरण को जन्म दिया । अकबर ने बहुत से भारतीय कलाकारों को सेवा में रखा था । हर चित्रकारी प्रायः भारतीय और फारसी मुगल कालीन कृति नूरजहां एक कलाकारों के सहकारी प्रयास का परिणाम थी कलाकार रेखांकन करता था , दूसरा उसमें रंग भरता था और तीसरा तफसील तैयार करता था । देशीकरण को उस समय और भी गति मिली जब अकबर ने रामायण और महाभारत के अनुवाद तैयार करने और उसे चित्रकारी से सजाने का आदेश दिया । राजपूत राजाओं के दरबारों में जो चित्रकार थे , वे प्रायः मुगल शिल्पकला में प्रशिक्षण प्राप्त कलाकार थे । लेकिन , जहां मुगल चित्रकारी संभ्रान्त कुलीनों की चित्रकारी थी , जिसमें शाही तड़क - भड़क और समारोह का अंकन होता था वहां राजपूत चित्रकारी में देश की महान कथाओं और आख्यानों , राम और कृष्ण की कथाओं और भागवत व गीतगोविन्द के आख्यानों का अंकन रेखा और रंग के संयोग से किया गया । मैदानी इलाकों या राजस्थान की अनेक रियासतों में से दो का विशेष उल्लेख करना जरूरी है । चित्रकारी की कोटा शैली में डुआनियर रूसो जैसे यूरोपीय चित्रकारों की आदिम संकल्पना और ओजस्विता को उनसे लगभग अस्सी साल पहले निरूपित किया गया । किशनगढ़ की चित्रकारी की शैली में राधा - कृष्ण कथा - काव्य का पूर्ण चित्रांकन मिलता है । मैदानी इलाकों के अनेक बहादुर राजपूत योद्धाओं द्वारा स्थापित हिमालय की घाटियों के छोटे राज्यों में चित्रकारी के कई केन्द्र अस्तित्व में आए , जिनमें बसोहली की चित्रकारी शैली में अभिव्यक्ति की तीव्रता , कुल्लू शैली में लोक शैली से उसकी निकटता और कांगड़ा शैली में रोमांसवाद और चित्रों की बहुलता आदि विशेषताएं विकसित हुईं । राजपूतों के काल के बाद इसमें रुकावट पैदा हुई । ब्रिटिश काल में पाश्चात्य प्रभाव की प्रमुखता रही . पाश्चात्य सैद्धान्तिक शिक्षावाद की लोकप्रियता बढ़ी । रवि वर्मा जैसे अग्रणी चित्रकारों ने स्वयं इसका अभ्यास किया , किन्तु अन्य बहुत से लोगों ने प्रशिक्षण संस्थाओं में शिक्षा प्राप्त की । रबीन्द्रनाथ टैगोर की अगुवाई में विकसित पुनर्जागरणवादी शैली के पीछे राष्ट्रवादी प्रेरणा थी । - भारत में आधुनिक चित्रकारी के चार अग्रगामी ये हैं गनेन्द्रनाथ टैगोर , जिन्होंने प्रत्येक टेक्नीक और शैली में प्रयास किया : अमृता शेरगिल , जिन्होंने पश्चिम की चित्रात्मक शैली और भारतीय कल्पना के बीच सामंजस्य स्थापित किया जैमिनी राय , जिन्होंने लोक शैली की ऊर्जस्विता को उजागर किया और उसे कई प्रतिरूपों में निरूपित किया और रबीन्द्रनाथ टैगोर , जिन्होंने चित्रकारी के लिए संगीत की स्वायत्तता की हिमायत की और उसे यथार्थता के शिकंजे से मुक्त कराने का अध्यवसाय किया और प्राकृतवाद , अमूर्तीकरण और अभिव्यक्तिवाद मुक्त के रूपों को मान्यता प्रदान की ।