मुगलकालीन कृति नूरजहां
इसी बीच सतही व्यापक भित्ति चित्रकारी ने पांडुलिपियों पर लघु चित्रकारी का रूप ग्रहण किया - शुरू में ताड़ के पत्रों पर , बाद में कागज पर बंगाल के पाल शासकों के काल ( दसवीं और बारहवीं शताब्दी ) की लघु चित्रकारी में अजंता की ऐन्द्रिय लीक अनुरक्षित है । किन्तु उसके बाद द्रुत पराभव आया और लीक नाजुक और कोणीय हो गई । में यही शैली पश्चिमी भारत में फैली और बारहवीं से पन्द्रहवीं शताब्दी की अवधि में बहुत - सी प्रदीप्त पांडुलिपियों में देखी जा सकती है । इनमें से अधिकांशः पांडुलिपियां जैन धर्म ग्रंथों की हैं । लेकिन पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध और सोलहवीं शताब्दी के प्रथम चतुर्थांश में परिवर्तन की हवा चलने लगी । वसन्त विलास , बिल्हण की और पंचाशिका और लौर चन्दा जैसी कविताओं की गीतमयता की अनुक्रिया के परिणामस्वरूप वह लीक पुनः नमनीय हो गई और रंग चमकदार हो गए । मुगलों के आगमन से पहले ही भारतीय लघु चित्रकारी की एक उत्तम चित्रमय शैली स्थापित हो चुकी थी । यद्यपि अकबर के दरबार में फारस के कलाकारों का प्राधान्य था , किन्तु मुगल चित्रकला फारसी चित्रकला की एक प्रान्तीय शैली नहीं कही जा सकती । फारसी चित्रकला रोमांस के स्वर्गीय लोक की ओर अभिमुख है , जबकि अकबर की रुचि समसामयिकता में दीखती है । कलाकक्ष ( स्टूडियो ) और उसकी कार्यशैली की व्यवस्था ने विदेशी शैली के द्रुत देशीकरण को जन्म दिया । अकबर ने बहुत से भारतीय कलाकारों को सेवा में रखा था । हर चित्रकारी प्रायः भारतीय और फारसी मुगल कालीन कृति नूरजहां एक कलाकारों के सहकारी प्रयास का परिणाम थी कलाकार रेखांकन करता था , दूसरा उसमें रंग भरता था और तीसरा तफसील तैयार करता था । देशीकरण को उस समय और भी गति मिली जब अकबर ने रामायण और महाभारत के अनुवाद तैयार करने और उसे चित्रकारी से सजाने का आदेश दिया । राजपूत राजाओं के दरबारों में जो चित्रकार थे , वे प्रायः मुगल शिल्पकला में प्रशिक्षण प्राप्त कलाकार थे । लेकिन , जहां मुगल चित्रकारी संभ्रान्त कुलीनों की चित्रकारी थी , जिसमें शाही तड़क - भड़क और समारोह का अंकन होता था वहां राजपूत चित्रकारी में देश की महान कथाओं और आख्यानों , राम और कृष्ण की कथाओं और भागवत व गीतगोविन्द के आख्यानों का अंकन रेखा और रंग के संयोग से किया गया । मैदानी इलाकों या राजस्थान की अनेक रियासतों में से दो का विशेष उल्लेख करना जरूरी है । चित्रकारी की कोटा शैली में डुआनियर रूसो जैसे यूरोपीय चित्रकारों की आदिम संकल्पना और ओजस्विता को उनसे लगभग अस्सी साल पहले निरूपित किया गया । किशनगढ़ की चित्रकारी की शैली में राधा - कृष्ण कथा - काव्य का पूर्ण चित्रांकन मिलता है । मैदानी इलाकों के अनेक बहादुर राजपूत योद्धाओं द्वारा स्थापित हिमालय की घाटियों के छोटे राज्यों में चित्रकारी के कई केन्द्र अस्तित्व में आए , जिनमें बसोहली की चित्रकारी शैली में अभिव्यक्ति की तीव्रता , कुल्लू शैली में लोक शैली से उसकी निकटता और कांगड़ा शैली में रोमांसवाद और चित्रों की बहुलता आदि विशेषताएं विकसित हुईं । राजपूतों के काल के बाद इसमें रुकावट पैदा हुई । ब्रिटिश काल में पाश्चात्य प्रभाव की प्रमुखता रही . पाश्चात्य सैद्धान्तिक शिक्षावाद की लोकप्रियता बढ़ी । रवि वर्मा जैसे अग्रणी चित्रकारों ने स्वयं इसका अभ्यास किया , किन्तु अन्य बहुत से लोगों ने प्रशिक्षण संस्थाओं में शिक्षा प्राप्त की । रबीन्द्रनाथ टैगोर की अगुवाई में विकसित पुनर्जागरणवादी शैली के पीछे राष्ट्रवादी प्रेरणा थी । - भारत में आधुनिक चित्रकारी के चार अग्रगामी ये हैं गनेन्द्रनाथ टैगोर , जिन्होंने प्रत्येक टेक्नीक और शैली में प्रयास किया : अमृता शेरगिल , जिन्होंने पश्चिम की चित्रात्मक शैली और भारतीय कल्पना के बीच सामंजस्य स्थापित किया जैमिनी राय , जिन्होंने लोक शैली की ऊर्जस्विता को उजागर किया और उसे कई प्रतिरूपों में निरूपित किया और रबीन्द्रनाथ टैगोर , जिन्होंने चित्रकारी के लिए संगीत की स्वायत्तता की हिमायत की और उसे यथार्थता के शिकंजे से मुक्त कराने का अध्यवसाय किया और प्राकृतवाद , अमूर्तीकरण और अभिव्यक्तिवाद मुक्त के रूपों को मान्यता प्रदान की ।